वन्दे मातरम् विवाद

updated on August 6th, 2017 at 10:28 am

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु में राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ को स्कूलों में हफ़्ते और सरकारी या ग़ैर-सरकारी दफ़्तरों में महीने में एक बार गाना अनिवार्य करने से इसे लेकर विवाद फिर गर्मा गया है। महाराष्ट्र में तो तीखी सियासी बयानबाज़ी हो रही है। यूपी समेत उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों में भी यह कुछ हिंदू और मुस्लिम संगठनों के बीच बहस का मुद्दा है। यह विवाद नया नहीं है। आज़ादी की लड़ाई के वक़्त क्या हिंदू और क्या मुसलमान, सभी ‘वन्दे मातरम्’ नारा लगाते थे। एक और नारा भी साथ-साथ लगता था- इंकलाब ज़िंदाबाद। भारतीयों की एकता से घबराए अंग्रेज़ों ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति ‘वंदे मातरम’ पर अपनाई और देश की तरह इसे बांटने में भी सफल हुए।

ग़ौर कीजिए कि तब से लेकर आज तक ‘वन्दे मातरम्’ को लेकर तो विवाद है, ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ कभी विवाद में नहीं रहा। ‘वंदे मातरम्’ पर बढ़ते विवाद के हल के लिए 1937 में कांग्रेस ने बाक़ायदा कमेटी बनाकर आपत्तियां मांगीं। तमाम बहस-मुबाहिसे के बाद तय हुआ कि गीत के शुरुआती अंतरे गाए जाएं, क्योंकि उनमें धार्मिक संदेश नहीं हैं। कमेटी में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, अबुल कलाम आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे दिग्गज शामिल थे। लेकिन विवाद आज 80 साल बाद भी क़ायम है और तुष्टीकरण की सियासत के लंबे दौर की वजह से देश में आज जो समाजिक हालात हैं, आगे भी रहेगा।

वन्दे मातरम् विवाद

अंग्रेज़ों और उनके तत्कालीन भारतीय एजेंटों ने समाज में ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ और ‘मुस्लिम राष्ट्रवाद’ की चिंगारियां सुलगाईं। आज़ादी के बाद से तुष्टीकरण की सियासत के पंखे से इसे लगातार हवा दी गई। ‘वंदे मातरम्’ जैसे सभी विवाद इसका ही नतीजा हैं। हिंदू हों या मुस्लिम, वोट बैंक की सियासत करने वाले ऐसे विवादों को सुलझने नहीं देंगे। लोगों तक हक़ीक़त नहीं पहुंचने देंगे, नफ़रत बढ़ाने का ही काम करेंगे। समझदार लोग ऐसे विवादों पर ध्यान नहीं देते। बहुत से मुस्लिमों को ‘वंदे मातरम्’ से ऐतराज़ नहीं है। लेकिन वे डरते हैं कि आवाज़ उठाई, तो उनके समाज के कट्टरपंथी उन्हें प्रताड़ित करेंगे।

‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे…’ यानी राष्ट्रगान पर कोई विवाद नहीं है। इसी तरह श्यामलाल पार्षद के गीत ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा…’ और इक़बाल के ’सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा…’ पर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। दुर्भाग्य की बात है कि राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ सांप्रदायिकता की चपेट में है। देश के समझदार लोगों को इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल नकारात्मक सियासी चर्चा का मुद्दा है।

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