रियलिटी शो का बच्चों पर असर

करीब एक साल पहले एसोचैम के एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि 76 फीसदी बच्चे घर में अकेले होने पर टेलीविजन पर रियलिटी शो देखते हैं। ऐसा कोई भी टीवी चैनल नहीं है जिसमें कोई न कोई रियलिटी शो न आ रहा हो। मुद्दा यह है कि रियलिटी शोज़ के नाम पर सच दिखाने वाले इन कार्यक्रमों में असल में कितना सच और कितना झूठ शामिल रहता है।

टीवी पर आ रहे रियलिटी शो और टैलेंट शो जहाँ कुछ की किस्मत चमका देते हैं तो कुछ को अस्पताल भी पहुँचा सकते हैं। जैसा हाल ही में कोलकाता की 16 साल की शिंजिनी सेनगुप्ता के साथ हुआ। शिंजिनी एक शो में नृत्य प्रतिस्पर्धा में भाग ले रही थी और एक राउंड में उनके खराब नाच पर शो के जजों की फटकार पर वे न केवल रोईं बल्कि उनको इतना सदमा लगा कि उन्हें लकवा मार गया। उनका बेंगलुरु के एक अस्पताल में इलाज हो रहा है और डॉक्टरों का कहना है की शायद उन्हें पहले से ही कुछ बीमारी थी, जिस पर सार्वजनिक फटकार ने उनकी ये हालत कर दी। शिंजिनी की हालत पर बहस इस बात पर छिड़ गई कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

इस तरह के शो पर भी सवाल उठने लगे और नियम कानून बनाने की चर्चा होने लगी। जाने-माने टीवी प्रोड्यूसर सिद्धार्थ बसु कहते हैं कि मैं समझता हूँ कि शिंजिनी के साथ जो घटना हुई है वो खतरे की घंटी है। चाहे बड़ा हो या छोटा, बेवजह किसी को भी अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों के लिए तो मापदंड अलग से तय होने ही चाहिए। अब वो दौर नहीं रहा, जब हम लोग, बुनियाद, रामायण जैसे धारावाहिकों का चलन था, जो समाज को संगठित होने की शिक्षा देते थे। इसके विपरीत अब दौर आ चुका है रियलिटी शो का, जिसमें भरपूर तरीके से आपके फैसलों में दखलंदाजी व जिंदगी में हस्तक्षेप किया जाता है। इसमें अगर कोई अँगुली उठती है तो जवाब होता है कि ये रियलिटी शो है भाई।

रियलिटी शो का बच्चों पर असर

रियलिटी शो की टीआरपी बढ़ाने के लिए आजकल रियलिटी शो में छोटे बच्चों को हथियार बनाकर बाजी खेली जा रही है, जिसमें शो के निर्देशकों की तो चाँदी हो रही है पर दूसरी ओर जीवन की जंग में उन बच्चों की हार हो रही है। इन शोज में फूहड़ता दिखाना कोई नयी बात नहीं है। रियल्टी शोज की हकीकत से अनजान बच्चे उसमें दिखाए गए गए घटनाक्रम को सही समझते हैं और उसे अपने जीवन के साथ जोड़ना शुरू कर देते हैं। इससे बच्चों की भाषा और सोच नकारात्मक होते जा रहें हैं। जिनमें कल तक जीत का जुनून था पर आज हार की मायूसी। पढ़ाई की उम्र में एक ओर जहाँ ये मासूम बच्चे एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं, वहीं पैसे व ख्याति का लालच इनसे इनका बचपन छीन लेता है व छोटी सी उम्र में ही बड़ा बना देता है।

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