आतंकवाद का इतिहास, आतंकवाद पर निबंध

आतंकवाद की शुरुआत तब हुयी जब मनुष्य ने अपने राजनितिक वर्चस्व को स्थापित करने के लिए अहिंसा का रास्ता अपनाया। पहली शताब्दी ईसा पूर्व में सीकरी (sicarii) नाम का एक यहूदी कट्टरपंथी संगठन हुआ जिसने यहूदा की ज़मीन से रोमन साम्राज्य को समाप्त करने के लिए रोमन ईसाईयों का क़त्ल करना शुरू कर दिया था। ऐसा ही एक इस्लामिक ग्रुप 11 से 13 शताब्दी के बीच ईरान और सीरिया में था जिसको हाशहाशिन बोला जाता था जो अब अंग्रेजी में अस्सासिंस (assassins) कहा जाता है। इस संगठन ने अब्बासिद और सेल्जुक सल्तनत की बड़ी-बड़ी राजनितिक हस्तियों को क़त्ल करके अपने विरोधियों के दिलों में ख़ौफ़ पैदा कर दिया था। भले ही आज के समय की आतंकवाद की परिभाषा के हिसाब से यह कटटरपंथी हत्यारे संगठन आतंकवादी न समझे जाते हों परन्तु इनका उद्देश्य भी सत्ता और धर्म को हिंसा और ख़ौफ़ के द्वारा ही स्थापित करना था। वास्तव में अंतरष्ट्रीय स्तर पर जिन राष्ट्रों की पकड़ मज़बूत होती है, जिनका दबदबा अंतर्राष्ट्रीय मॉस मीडिया पर होता है, वही कौनसी हिंसा आतंकवादी हिंसा है कौन सा संगठन आतंकवादी संगठन नहीं है निर्धारित करते हैं।

आतंकवाद शब्द फ्रेंच क्रांति के दौरान आतंक का राज नाम से दर्ज एक विद्रोह से आया है जिसको मैक्समीलियन रॉबस्पियररे नाम के व्यक्ति ने भड़काया था, बाद में उसे इसके मौत की सजा भी हुयी थी। इस घटना में हज़ारों की तादात में लोग मारे गये थे, रॉबस्पियररे अपने इस जुर्म को सही साबित करने के लिए कहा कि स्वतंत्र राष्ट्र निर्माण के लिए ऐसा करना आवश्यक था। शायद इसी से आज के नये आतंकवाद ने प्रेरणा ली है जो यह समझते हैं हिंसा से ही बेहतर राज्य प्रणाली का निर्माण हो सकता है, जैसा कि नरोदनाया वोल्या (Narodnaya Volya) ने 19वीं शताब्दी में इसी तरह की आशा तसरिस्त (Tsarist) राज को ख़त्म करने के लिए की थी। परन्तु आज स्तिथि यह पैदा हो गयी है, यदि मुजूदा राजनितिक कलंको और दोषों का कोई विरोध करता है तो उसे भी राजद्रोही के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। 19वीं शताब्दी तक आतंकवाद एक स्टेट एक्टिविटी समझा जाता था जिसमें विद्रोही सरकार या शासक की नीतियों के ख़िलाफ़ हथियार उठाने वाले माने जाते थे।

1950: आतंकवाद का नया रूप

गोरिल्ला रणनीति का जन्म होते ही नॉन-स्टेट आतंकवाद की शुरुआत हुयी, जिसने उस समय जातीय राष्ट्रवादी लोगों (आयरिश, बास्क और जिओनिस्ट) और एंटी-कोलोनियल ताक़तों को हवा दी जिससे कम्युनिज्म जैसी नयी विचारधारा का जन्म हुआ। यह दौर अलग-अलग संगठनों का था जो देश के नाम पर दुनियां के अलग-अलग हिस्सों में हथियार उठा रहे थे, जैसे आयरिश रिपब्लिकन आर्मी का गठन आयरलैंड को ब्रिटैन कैथोलिक स्टेट से स्वतंत्र गणराज्य बनाने के लिए किया गया था।

इसी तरह मध्य-पूर्व के देश तुर्की, सीरिया, ईरान और इराक़ में कुर्द लोगों ने हथियार उठा रखे थे, कुर्दिस्तान वर्कर पार्टी 1970 में बनी जिसने अलग कुर्द राज्य के लिए आतंकवाद का रास्ता अपनाया था। श्रीलंका में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम नाम एक तमिल अल्पसंख्यक समूह पैदा हुआ जिसने श्रीलंकन सिन्हालेसे सरकार के खिलाफ विद्रोह छेड़ा, जिसमे उन्होंने आत्मघाती बम हमलों जैसे आतंक फैलाने के नए तरीके ढूंढ निकाले, जिसका नुक्सान भारत को भी राजीव गाँधी की हत्या के रूप में उठाना पड़ा। 1960 तक आते-आते अंतराष्ट्रीय आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा बन गया था, क्यूंकि इसी दौर के दौरान दुनियां ने आतंक के और भी नए-नए रूप देखे।

इस दौर में हवाई जहाज़ों के हाईजैक होने की कई घटनाओं ने पुरे विश्व को चौंका दिया, 1968 में फिलिस्तीनी विद्रोहियों ने इज़राइली हवाई जहाज़ को हाईजैक किया। बीस साल बाद पैन एम् फ्लाइट नाम के एक यात्री जहाज़ को आतंकियों ने बम से उड़ा दिया, इस घटना ने पुरे विश्व को सदमे की हालत में ला दिया था। अब यह मुद्दा वाक़ई बहुत गंभीर हो चुका था क्यूंकि अब तक हमले ज़मीन पर होते थे परन्तु यह पहला मौक़ा था किसी विमान को निशाना बनाया गया था। लेकिन इसके बाद यह सिलसिला थमा नहीं और बढ़ता ही चला गया।

1990: धार्मिक आतंकवाद का व्यापक दौर

यह दौर धार्मिक आतंकवाद को लेकर आया जो हिंसा का और ज़्यादा खतरनाक रूप था, जिसने हर तरफ भयंकर तबाही मचाई। असल में अब आतंकवाद एक पैसा बनाने का ज़रिया बन चुका था, जिसने हथियार उत्पादकों के हथियार के धंदे में चार चाँद लगा दिए थे, मुनाफा दोनों ही तरफ होना है चाहे उनको आतंकी इस्तेमाल करे या उनको खत्म करने के लिए किसी देश की सेना, हर हाल में मुनाफा हथियार कंपनी का ही होना है।

धार्मिक आतंकवाद
धार्मिक आतंकवाद

जैसा की अफ़ग़निस्तान में हुआ जिसको अमेरिका ने ख़ुद ओसामा बिन लादेन और अल क़ायदा के रूप में में पैदा किया, और फिर ख़ुद ही उसको ख़त्म करने के लिए अपने फौजें वहां लगा दीं। असल में आतंकवाद को धर्म जामा पहनाकर अंतर्राष्ट्रीय मंडी के कुछ लोग अपने धंदे चमकाते हैं, जैसा की विश्व में इस्लामिक आतंकवाद जैसा हिंसा का ब्रांड प्रचलित हो चुका है। देखने में ऐसा लगता यह कट्टरपंथी धार्मिक उद्देश्यों के लिए आतंक फैला रहे हैं परन्तु यह लोग ख़ुद धर्म से कोसों दूर होते है, 9/11 का एक हमलावर मोहम्मद अता मिस्र का रहने वाला था जो हमके दौरान जहाज़ चला रहा था। अता को शराब की लत थी और उस दिन भी वह सहराब के नशे में था, जबकि शराब मुसलमान जो इस्लाम को सही से मानते है वो उसको हाँथ तक नहीं लगाते।

वास्तव में अता जैसे लोगों की गलती नहीं है बल्कि गलती उन रूढ़िवादी कट्टरपंथी लोगों की है जो इन जैसे पता नहीं कितने कम इल्म नौजवानों का इस्तेमाल अपने मतलब के लिए करते हैं, यह लोग धार्मिक किताबों की शिक्षाओं को भी तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं।

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