नोटबंदी

भारतीय रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले साल आठ नवंबर को नोटबंदी के बाद पांच सौ और एक हज़ार के 99 फ़ीसदी पुराने नोट बैंकों में वापस आ गए है। इस ख़ुलासे के बाद विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर है और सवाल पूछ रहा है कि केवल एक फ़ीसदी काले-नोट यानी 16 हज़ार करोड़ रुपए वापस नहीं आना इतने बड़े फ़ैसले की उपलब्धि कही जा सकती है? यह सवाल तब और गंभीर हो जाता है, जब नए नोटों की छपाई में 21 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए गए हों। विपक्ष के इस आरोप और सवाल पर बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई भी उपलब्धि तात्कालिक रूप से महज़ रुपए के आधार पर आंकी जा सकती है? नोटबंदी से अगर कश्मीर में आतंकियों की कमर टूटी, तो क्या कम बड़ी उपलब्धि है? नोटबंदी के देश में पाकिस्तान से छपकर आ रही जाली करेंसी पर रोक लगी, तो क्या यह उपलब्धि नहीं है? क्या इससे ड्रग्स के काले कारोबार पर अंकुश नहीं लगा है? क्योंकि आप विपक्ष में हैं, तो कालेधन की इतनी सीमित परिभाषा गढ़ सकते हैं?

नोटबंदी के बाद अगर देश की अर्थव्यवस्था कैसलैश होने की ओर बढ़ी है, तो क्या यह कम बड़ी उपलब्धि है? कोई भी फ़ैसला तात्कालिक नफ़े-नुकसान को देखते हुए नहीं किया जाता। नोटबंदी के बाद जिस गति से हम कैशलैस व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, क्या यह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है? क्या इससे टैक्स चोरी और रिश्वतख़ोरी जैसे दूसरे भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगेगा?

नोटबंदी के बाद लोगों के घरों में पड़े तीन लाख करोड़ रुपए बैंकिंग सिस्टम में आए। इससे आम लोगों को ही फ़ायदा हो रहा है। लोन सस्ते हो रहे हैं, तो क्या यह ग़लत है? इस साल 56 लाख टैक्स पेयर बढ़े हैं, यह नोटबंदी का सीधा फ़ायदा है। नोटबंदी के बाद अभी तक दो लाख फ़र्ज़ी कंपनियों का पता लगा है, जिनके ज़रिए कालेधन का लेन-देन हो रहा था।

लगभग 18 लाख ऐसे लोगों का पता चला, जिनके पास आमदनी से ज्यादा संपत्ति है। सरकार की आमदनी बढ़ेगी, तो देश के आम लोगों के लिए विकास के नए रास्ते तैयार होंगे। देश को पतन की ढलान पर धकेलने वाली पिछली सरकारों के नेताओं को इसमें क्यों ऐतराज़ है?

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